अस्पतालों की अवस्था


स्वास्थ्य जीवन की प्राथमिकता है. स्वास्थ्य ठीक नहीं तो कुछ भी ठीक नहीं. स्वास्थ्य यदि ठीक नहीं तो उसे कैसे ठीक किया जाए यह भी एक प्रश्न है. आजकल चिकित्सक पर भी पूरी तरह से विश्वास करना कठिन है. चिरपरिचित अस्पताल और सुप्रसिद्ध डॉक्टर से भी विश्वास उठ जाता है.


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कुछ साल पहले श्रीमतीजी का स्वास्थ्य खराब रहने लगा था. छह महीने बीत गए तब हमने निर्णय लिया कि किसी विद्वान महिला डॉक्टर को दिखाना चाहिए. श्रीमती जी को लेकर मैं विकास मार्ग पर लक्ष्मी नगर के एक सुप्रसिद्ध अस्पताल गया.


डॉक्टर ने दो दिन की दवाई लिखी और दो दिन बाद फिर आने को कहा. दो दिन बाद फिर हम गए तो उस महिला डॉक्टर ने मेरी पत्नी से कहा कि – “आपकी बीमारी कुछ अलग दिख रही है. आप हमारे एक्सपर्ट डॉक्टर को दिखाओ, पर उनकी फीस ज़्यादा है. 

हम राज़ी हो गए. एक्सपर्ट को दिखाया तो उन्होंने सी. टी. स्कैन, ब्लड टेस्ट वगैरह के लिए कहा. सब रिपोर्ट्स लेकर फिर उस एक्सपर्ट के पास गए तो उन्होंने कहा कि – “आपके सीने में गाँठ है. यह गाँठ टी. बी. की भी हो सकती है और कैंसर की भी.हम घबरा गए. 

आगे वे बोले – “मैं आपको एक कैंसर स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल में भेजता हूँ. उनकी जांच फीस सात सौ रुपये है.हम उनसे पता लेकर घर आ गए और सोचने लगे कि वह डॉक्टर सात सौ रुपये मात्र चेकअप के लेते हैं तो आगे क्या होगा? दो-चार दिन हम सोचते रहे. पैसों का बंदोबस्त नहीं था इसलिए मैंने नागपुर में रहने वाले अपने छोटे भाई को फ़ोन किया और अपनी परिस्थिति से अवगत कराया. उन्होंने सलाह दी कि – “किसी फ़र्ज़ी डॉक्टर के कहने में मत आना, सरकारी अस्पताल में ही इलाज ठीक रहेगा.


हम बंगाली मार्केट के बाबर रोड गए. वहां कैंसर सोसाइटी का एक क्लीनिक है, वहां दिखाया. चेकअप के बाद डॉक्टर ने ये कहा कि कैंसर नहीं है. उन्होंने शक दूर करने के लिए हमें AIIMS जाकर दिखाने के लिए कहा. सफदरजंग स्थित इस अस्पताल के कैंसर विभाग में जाकर सारे कागज़ एवं रिपोर्ट्स दिखाई. उन्होंने कहा कि कल सवेरे O.P.D. में दिखाओ.  


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दूसरे दिन आकर O.P.D. में दिखाया. उन्होंने चौथी मंज़िल पर भेज दिया. दो  घंटे बाद नंबर आया. डॉक्टर ने चेकअप करने के बाद एक सप्ताह बाद फिर बुलाया. इसी तरह चार हफ्ते बीत गए. परेशान होकर हमने डॉक्टर से कहा कि न तो आप दवाई दे रहे हैं और अगले सप्ताह आने की ही बात करते हो. 

कहने लगे – “आपको सीनियर डॉक्टर को दिखाना है और आज भी वे ऑपरेशन थिएटर में हैं. अगले सप्ताह आइये, आपसे उनकी मुलाकात करवाते हैं.” 


अगले सप्ताह गए तो फिर वही स्थिति थी. उन्होंने ग्राउंड फ्लोर पर टी. बी. विभाग में भेजा. वहां पर आरम्भ से इलाज शुरू हुआ. लगातार दस हफ्ते जाते रहे. फिर उन्होंने X-Ray व सी. टी. स्कैन अपने पास रख लिए और दूसरे दिन आने को कहा.  

दूसरे दिन गए तो डॉक्टर ने कहा कि मरीज़ को टी. बी. है. उन्होंने चार सौ रुपये महीने की दवाई लिख कर दी. वह दवाई श्रीमतीजी तीन महीने तक लेती रहीं. उसके बाद उसमे 25% दवाई घटाई गयी. फिर तीन महीने इलाज चला. छह महीने में टी. बी. की बीमारी ख़त्म हुई. अब पत्नी का स्वास्थ्य एकदम ठीक है.
 

अंत में यही कहा जा सकता है कि यदि स्वास्थ्य खराब हो जाता है तो चिकित्सक पर विश्वास करना कठिन है. आज अस्पताल भी व्यापार का स्थान बन गए हैं. मजबूर व्यक्ति धन खर्च करके अपना इलाज तो करवा सकता है, परन्तु जो निर्धन है उसे मृत्यु को स्वीकार करना पड़ता है.  

दिल्ली के सफदरजंग क्षेत्र में AIIMS नाम का अस्पताल भले ही इलाज की दृष्टि से प्रथम श्रेणी का है, परन्तु वहां की प्रशासन व्यवस्था ठीक नहीं है. नंबर की प्रतीक्षा दो-दो घंटों तक करनी पड़ती है. AIIMS का स्टाफ अपने मरीज़ बिना लाइन के डॉक्टर के पास पहुंचाता है. डॉक्टर को भी ऐतराज़ नहीं है. मरीज़ को पूछताछ कक्ष से सही सलाह भी नहीं मिल रही. पूछा कुछ जाता है और बताया कुछ जाता है.


पर ईश्वर की कृपा से सोच समझकर कष्ट उठकर यदि इलाज करवाया जाए तो सरकारी अस्पतालों में ही समाधान है. प्राइवेट अस्पताल व नर्सिंग होम मात्र धनी लोगों के लिए हैं. इसलिए गरीब लोग सरकारी अस्पतालों की तरफ अधिक भागते हैं. दिल्ली के हर बड़े से बड़े सरकारी अस्पताल में ग्रामीण लोग अधिक आते हैं.

ग्रामीण लोगों के पास न तो पैसा है न समय और न इलाज का ज्ञान है. इसलिए सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीज़ों की गरीबी व दयनीय अवस्था दिखाई देती है. अस्पताल के हालात देखकर जो गरीबी का स्पष्ट चित्र है वह दिखाई देता है. ईश्वर करे हर व्यक्ति अपने घर में सुखी रहे और उसे अस्पताल के चक्कर न काटने पढ़ें.

First Chapter of Romantic Novel 'NARMADA'



In those days, I was pursuing my Engineering from I.I.T., Delhi. I only had few more exams left for third year. 30th April was the last day for exams. It was convenient as well as difficult to study in a hostel.
My parents lived in Bhopal. Our bungalow was on the Bairagarh Road. My father was the contractor for the construction of bridges and roads for past two decades and was mostly busy in contracts given by Madhya Pradesh Government.

He got a big tender in Baitul valley last year. Around four hundred labourers were working together on a daily basis and our company was growing persistently.

I was 22 years old and my parents were constantly discussing about my marriage. When they wanted to know my decision for the same, I gave my consent. First they proposed Varsha’s name (our ex-neighbour Vermaji’s daughter) before me. She was pursuing M.A. in English Literature from Bhopal itself. We had good relations with Vermaji’s family for the past ten years. 
I and Varsha often used to play, hang around and eat together. For the past two years, she started avoiding confronting me. Whenever I asked the reason, she would smile and walk away.
Nearly six months ago, I met Varsha in a social programme in Bhopal. While talking to me, she asked my hostel’s address. After that, she even wrote some letters to me, but I did not reply for even a single time.
Once the exams got over, I started preparing to return to my home in Bhopal and wrote a letter to my mother and informed her. On the day of journey, I boarded an Express Train from New Delhi Railway Station at 7 in the morning and reached Bhopal Railway Station at 4 pm on the same day. Our car driver had come to receive me. At 5 pm, I was at home.
It was summer and was very hot. As soon as I reached patio our maid 'Jaanki' opened the door and greeted me. Drawing room cooler soothed my mind. I felt silence at home. Till now, Mom would have welcomed me with words - “Oh! Son, u came”.
Housemaid Jaanki came and said - “Have bath. Tea is ready”. I ordered her to bring tea and said - “I’ll have tea before shower”.
I thought Mom would be sleeping in her room. I went to have bath and got dressed. Then Jaanki asked if she can serve the breakfast but I asked her to awake Mom first.
She told me that Mom has gone to Baitul Valley. It was being ten days since she was not at home. Jaanki said - “Ma’am has wrote a letter for you.”
I asked - “Where is that letter? Show me.”
She went to Mom’s room and I followed her. She picked up the letter lying on the table and handed it to me. I started reading the letter:
“Dear Babu (My Name),
I got to know that you are coming home from Delhi. I am leaving for Baitul Valley due to some reason and have to stay there for some days. After reaching home, you too come here.
Rest is fine. 
Your Mom”

मदर टेरेसा का योगदान


      
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1980  के  दरम्यान  हमारे  देश  में  मदर  टेरेसा  का  नाम  बहुत  चर्चित  था।   मदर  टेरेसा  ने  समाज  सेवा  की,  ऐसी  सेवा  हर  कोई  नहीं  कर  सकता।  मदर  टेरेसा  का  कोलकाता  में  एक  आश्रम  था  और  उस  आश्रम  में  वे  बेसहारा  लोगों  को  ले  आती  थीं  और  उनकी  चिकित्सा  करती  थीं।


वे  बेसहारा  लोग  कौन  थे?   जो  लोग  बेघर  थे  और  सड़क  पर  रहते  थे,  उनको  न  खाना  मिलता  था  न  पानी,  फिर  वे  बीमार  पढ़  गए।  उन्हें  न  दवाई  मिल  रही  थी  न  कोई  साधन।  अंततः  वे  सड़क  पर  ही  बेसहारा  अवस्था  में  दम  तोड़  रहे  थे।  ऐसे  बेसहारा  लोगों  की  सेवा  के  लिए  मदर  टेरेसा  ने  बहुत  कष्ट  उठाये।  

अमेरिका  की  एक  पत्रिका  में   दिसम्बर  अंक  में  विदेशी  पत्रकार  ने  मदर  टेरेसा  का  साक्षात्कार  प्रकाशित  किया।  पत्रकार  ने  मदर  टेरेसा  से  प्रश्न  किया  -  "हिंदुस्तान के बारे में आपकी क्या राय है?"

मदर टेरेसा ने उत्तर दिया - "मैं  सभी  धर्म  के  लोगों  से  प्रेम  करती  हूँ।"

पत्रकार  ने  एक  और  प्रश्न  किया  -  "आप  के  लिए  सबसे  अधिक  आनंदित  स्थान  कौन  सा  है,  जहाँ  आप  बार  -  बार  जाकर  ख़ुशी  महसूस  करती  हैं?"

मदर  टेरेसा  ने  उत्तर  दिया  -  "मुझे  कालिघाट  पसंद  है,  जहाँ  खुशी  के  लिए  खुशी  से  जीते  हैं।  यह  बहुत  सुन्दर  विचारधारा  है  कि  भारत  देश  के  गरीब  लोग  अपने  परिवार  के  साथ  आनंद  के  साथ  रहते  हैं।"

कालीघाट  कोलकाता  की  एक  गली  का  नाम  है  जहाँ  मदर  टेरेसा  का  आश्रम  है  जो  गरीब  लोग  हैं  उनमें  से  भी  गरीब  लोग  जिनके  लिए  भोजन  नहीं,  पानी  नहीं,  बीमारी  के  इलाज  के  लिए  दवाई  नहीं,  उन  लोगों  को  मदर  टेरेसा  अपने  आश्रम  में  ले  आती  थीं।  उन्होंने  उस  स्थान  पर  कोलकाता  के  इतिहास  में  54  हज़ार  लोगों  को  आश्रय  दिया  जिनमें  से  23  हज़ार  लोग  मृत्यु  को  स्वीकार  कर  गए।  यह  23  हज़ार  लोग  वे  लोग  थे  जो  कई  दिनों  से  भूखे - प्यासे  थे  और  किसी  बीमारी  के  कारण  बिस्तर  पर  पढ़े  थे।  

पत्रकार  ने  एक  और  प्रश्न  किया  -  "भविष्य  के  लिए  आपकी  क्या  योजनाएं  हैं?"
मदर  टेरेसा  ने  कहा  -  "जो  दिन  गुज़र  रहा  है  मैं  उसी  के  बारे  में  सोचती  हूँ  कल  कभी  लौटकर  आएगा  नहीं  और  आने  वाले  कल  का  भी  कोई  भरोसा  नहीं।"

मदर  टेरेसा  का  मिशन  सत्य  पर  आधारित  था।  उन्होंने  मानवीय  सेवा  सहजता  से  की।  जिसके  लिए  न  तो  कोई  प्रलोभन  था  न  ही  आर्थिक  दृष्टिकोण।  एक  विशेष  सामाजिक  सेवा  थी।  मदर  टेरेसा  ने  इसे  गॉड  गिफ्ट  कहा।  उन्हें  भारत  सरकार  ने  भारत  रत्न  पुरस्कार  से  सम्मानित  किया  था।  उनका  कार्य  भविष्य  के  लिए  प्रेरणादायक  था  जिन्हें  लोग  आज  भी  याद  करते  हैं।  5  सितम्बर,  1997  को  उनका  निधन  हो  गया 

मदर  टेरेसा  जैसे  बहुत  से  महानुभव  हमारे  देश  में  थे,  आज  भी  हैं  और  आगे  भी  रहेंगे।  पर  समय  बदल  रहा  है।   मनुष्य  के  प्रति  मनुष्य  की  सहानुभूति  नहीं   रही  है।  पूरे  समाज  का   चित्र  अब  बदल  चुका  है।

पर्यटन स्थल मांडू - रानी रूपमती एवं बाज़ बहादुर की अमर प्रेम कथा का साक्षी



यदि हम राज्यों की धरोहर एवं पर्यटन क्षेत्र की चर्चा करें तो हमारे देश के राज्य सम्पन्न संस्कृति से भरे-पूरे राज्य मने जाते हैं. हर राज्य की अपनी संस्कृति व भाषा है और इसी के आधार पर राज्य की पहचान मानी जाती है. मध्य प्रदेश विकासशील राज्य माना जाता है. परन्तु किसी भी राज्य की विरासत व पहचान बदल नहीं सकती . पर्यटन क्षेत्र व पर्यटन स्थल नष्ट नहीं हो सकते. ऐसा ही एक स्थान मध्य प्रदेश में है, जिसका नाम है - मांडू. कहा जाता है कि मांडू मध्य प्रदेश की धरती पर ऐसा ऐतिहासिक पर्यटन स्थल है जिसका सौंदर्य देखते ही बनता है. मांडू की हरी-भरी धरती गर्मियों के मौसम में और निखर जाती है. इसकी एक विशेषता यह भी है कि यहां का पर्यटन स्थल खंडहरों से बना है और उन खंडहरों से एक ऐसी सुन्दर स्त्री की प्रेम कहानी झलकती है जिसके प्रेम की दूर-दूर तक चर्चा है. उस स्त्री का नाम है रानी रूपमती. रानी रूपमती के किस्से मध्य प्रदेश की धरती पर विश्वास एवं सम्मान के साथ सुने जाते हैं.


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देशी-विदेशी पर्यटक जब मांडू के लिए चल पड़ते हैं तब मार्गदर्शन करने वाले गाइड सबसे पहले रानी रूपमती की प्रेम कहानी आरम्भ करते हैं क्योंकि मांडू का दूसरा नाम रानी रूपमती की प्रेम कहानी है. रानी रूपमती व बाज़ बहादुर की प्रेम कहानी अर्थात पत्थरों एवं खंडहरों से एक ऐतिहासिक अमर प्रेम कहानी उभर कर सामने आती है. ऐतिहासिक पत्थरों से बने बड़े-बड़े दरवाज़े पर्यटकों का स्वागत करते हैं, तब ऐसा लगता है कि जिस समय पूरे स्थल के बाँध का काम चल रहा होगा तब के इंजीनियर, मिस्त्री व मज़दूर कैसे होंगे? आज तो ऐसे इंजीनियर दिखाई नहीं देते. क्योंकि विशालकाय महलों का निर्माण तो बंद हो गया है. बारह फुट से ऊँचें किसी इमारत के दरवाज़े नहीं हैं.

उस समय के शासक भी समृद्ध शासक होते थे. कोई भी काम करते थे तो इतिहास रचने के लिए करते थे. महल बनाने और वहां रहने का स्थान एकांत तथा पहाड़ी क्षेत्र को चुनते थे जहां जनसाधारण रहने के लिए न पहुंचे.

जून महीने में जब बरसात होती है तो उस बरसात का रंग जुलाई महीन में दिखाई देता है और पूरे मांडू क्षेत्र में हरियाली छा जाती है और इस हरियाली का आकर्षण यहां आने वाले पर्यटक, विशेष रूप से प्रेमी जोड़े बाज़ बहादुर व रानी रूपमती के चर्चे में खो जाते हैं. इसी कारण आषाढ़ व श्रावण मास में यहां पर्यटकों का मेला सा लगा रहता है. 


इतिहास के पृष्ठों में यह भी लिखा है कि किसी समय मालवा नाम का एक राज्य था और उस राज्य की राजधानी मांडू नगर था. यहां का राजा बादशाह बाज़ बहादुर के नाम से प्रसिद्ध था. बड़ी-बड़ी प्रेम कहानियां जैसे – लैला-मजनूँ, हीर-रांझा रोमियो-जूलिएट प्रसिद्द हैं, इसी तरह इस मालवा राज्य में बादशाह बाज़ बहादुर की प्रेम कहानी प्रसिद्ध है. रूपमती नाम की बहुत सुन्दर स्त्री से बाज़ बहादुर का प्रेम हो जाता है. पहले वो राजा की प्रेमिका थी और बाद में राजा की पत्नी बनकर रानी बन गयीं. बाज़ बहादुर व रानी रूपमती में अटूट प्रेम था, यह मालवा के लोक गीतों में झलकता है.

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रानी रूपमती के लिए उनके नाम से एक महल भी बनवाया गया था. ऊंची पत्थर की चट्टान जिसकी ऊंचाई 400 मीटर है, ऐसे स्थान पर बाज़ बहादुर ने अपनी रानी का महल बनवाया था जिससे रानी को कोई देख भी न सके. ऐसा भी कहा जाता है कि उस महल से चारों तरफ का नज़ारा बहुत ही आकर्षक दिखाई देता है. रानी रूपमती अपने महल से दूर से बहती हुई नर्मदा नदी की बहती जलधारा की खूबसूरती को निहारती थीं. यह बताया जाता है कि रानी के आदेश व इच्छानुसार बाज़ बहादुर के महल का एक-एक डिज़ाइन तैयार करवाया गया था. 

इतिहास के पन्नों में यह भी लिखा है कि सन्‌ 1561 में मुग़ल बादशाह अकबर की सेना के जनरल आदम खान ने मालवा पर आक्रमण किया और बाज़ बहादुर को पराजित कर दिया था. उस अवस्था में रानी रूपमती को खोज निकाला गया क्योंकि रानी रूपमती की सुंदरता की खबर शत्रुओं को भी थी. रानी रूपमती शत्रुओं के हाथ लग गयी, परन्तु रानी रूपमती ने शत्रुओं के आगे समर्पण न करते हुए प्राण त्याग दिए. इसी घटना के साथ रानी रूपमती व बाज़ बहादुर की प्रेम कहानी अमर हो गयी. 

मांडू में देखने योग्य और भी स्थान हैं जैसे कि जहाज़ महल, हिंडोला महल, होशंग शाह का मक़बरा, नीलकंठ शिव मंदिर, वास्तुकला से निर्मित जामी मस्जिद. यही मांडू की ऐतिहासिक धरोहरें हैं.


उपन्यास ‘दंश’ का प्रथम अध्याय



first chapter of novel dansh by author laxman rao
दंश   -  साहित्यकार लक्ष्मण राव
उस  समय  सुबह  के  सात  बज  रहे  थेपंजाब  मेल  पूना  पहुँच  चुकी  थीपूना  रेलवे  स्टेशन  से  टैक्सी  लेकर  मैं  उस  गेस्ट  हाउस  पहुंचा  जहां  मुझे  ठहरना  था.

वह  गेस्ट  हाउस  केवल  उच्च  शिक्षा  अधिकारियों  के  लिए  थाहमारे  पंजाब  के  बलवंत  सिंहजी  महाराष्ट्र  शिक्षा  विभाग  में  उच्च  शिक्षा  अधिकारी  थेउन्होंने  ही  मुझे  अनुमति  पत्र  देकर  उस  गेस्ट  हाउस  में  ठहरने  की  अनुमति  प्राप्त  करवाई  थी.

गेस्ट  हाउस  के  स्वागत  कक्ष  में  जाकर  मैंने  अनुमति  पत्र  दिखायास्वागत  कक्ष  अधिकारी  ने  मेरा  नाम - पता  लिखकर  मुझे  एक  कक्ष  की  चाबी  दी  और  कर्मचारी  को  बुलवाकर  मेरा  सामान  प्रथम  तल  पर  आरक्षित  कक्ष  तक  पहुंचाने  का  आदेश  दियामैंने  उन्हें  धन्यवाद  कहा  और  अपने  कक्ष  के  पास  जाकर  दरवाज़ा  खोलकर  सामान  अंदर  रखवाया    कर्मचारी  को  चाय - पानी  के  नाम  से  कुछ  पैसे  दिएवह नमस्ते  बाबूजी’  कहकर  चला  गया.

मैं  बहुत  थक  चुका  था.  दरवाज़ा  अंदर  से  बंद  करके  मैं  सो  गया  और  फिर  चार  घंटे  के  बाद  मेरी  आँख  खुलीस्नान  करके  मैं  तैयार  हो  गयातब  तक  दोपहर  का  एक  बज  चुका  था. मेरी  नज़र  दरवाज़े  पर  पड़ी  जहां  फर्श  पर  एक  पर्चा  पड़ा  हुआ  था, शायद  वह  मेरे  लिए  मैसेज  थामैं  उस  पर्चे  को  उठाकर  पढ़ने  लगाउसमें  लिखा  था  –  “सरदार  बलवंत  सिंहजी  का  आपके  लिए  दो  बार  फोन  आया  थाआप  कृपया  उनसे  संपर्क  करें.”

उस  पर्चे  को  लेकर  मैं  स्वागत  कक्ष  में  पहुंचा  और  वह  पर्चा  अधिकारी  को  दिखायाउन्होंने  सरदारजी  साहब  को  फ़ोन  लगायाफिर  उन्होंने  रिसीवर  मुझे  सौंप  दिया  और  मैं  बात  करने  लगा.

मैंने  कहा  –  “जी  सरमैं  परमजीत  बोल  रहा  हूँ.”

उन्होंने  कहा  –  “ठीक  से  पहुँच  गए  ?”  मैंने  सकारात्मक  उत्तर  दिया.

आगे  उन्होंने  कहा  –  “अभी  मैं  ऑफिस  में  हूँशाम  को  मेरे  घर  पहुंचनाहम  आगे  की  योजना  बनाएँगेठीक  है?”

मैंने  कहा  –  “जी  ठीक  है  सर.”  उन्होंने  फ़ोन  रख  दियापश्चात  मैं  भोजन  कक्ष  में  जाकर  भोजन  करने  लगा.

बलवंत  सिंहजी  तीस - पैंतीस  वर्षों  से  महाराष्ट्र  प्रदेश  में  रहते  थेकभी  बम्बईकभी  नांदेडकभी  पूनापरन्तु  इस  समय  वे  पूना  विद्यापीठ  के  शिक्षण  संस्थान  में  उच्च  अधिकारी  थेवे  पंजाब  में  हमारे  ही  गाँव  के  रहने  वाले  थेमेरे  पिताजी  के  साथ  उनकी  गहरी  मित्रता  थीवे  बार - बार  मेरे  पिताजी  से  कहते  थे  –  “अपने  लड़के  को  ऑफिसर  बनाओयदि  मेरी  कोई  सहायता  लगे  तो  अवश्य  बताना.”

उन्ही  के  कहने  पर  मैं  पूना  आया  थामैंने  पंजाब  यूनिवर्सिटी  से  बी ए.  किया  था  और  अब  अंग्रेजी  विषय  में  एम.ए.  करना  चाहता  था. वे  मेरे  सामने  पूना  के  फर्गुसन  कॉलेज  की  बहुत  बार  प्रशंसा  कर  चुके  थेकहते  थे  –  “एक  बार  तुम  फर्गुसन  कॉलेज  की  बिल्डिंग    परिसर  देख  लेनातुम्हारी  आँखें  खुल  जाएंगीतुम  सोचते  ही  रह  जाओगे  कि  उच्च  शिक्षा  क्या  होती  है.”


भोजन  करते - करते  मैं  यही  सोच  रहा  था  कि  सबसे  पहले  फर्गुसन  कॉलेज  देखूंक्योंकि  अब  मेरे  पास  समय  भी  थाभोजन  करके  पूछताछ  करते  हुए  मैं  घूमते - फिरते  फर्गुसन  कॉलेज  पहुँच  गया  और  मैं  देखता  ही  रह  गयाजिस  छात्र  को  अध्ययन  की  जिज्ञासा  है  वह  छात्र  ऐसे  ही  शिक्षण  संस्थानों  को  देख  लेमन  को  शान्ति  मिल  जाएगीमैं  सपने  देखने  लगाइसी  कॉलेज  में  मुझे  एम.ए.  के  लिए  एडमिशन  मिल  जाना  चाहिएपंजाब  की  तुलना  में  पूना - बम्बई  वास्तव  में  शिक्षा  के  माध्यम  से  बहुत  उच्चकोटि  के  शहर  थे.

अब  मेरा  मन  पूना  की  तरफ  खिंचता  चला  जा  रहा  थाशाम  को  मैं  सरदारजी  साहब  के  घर  पहुँच  गयारात  का  भोजन  भी  मैंने  उन्हीं  के  घर  कियाउनका  भी  भरा - पूरा  परिवार  थापत्नी - बच्चे  व  उनके  माता - पिता  भी  उन्हीं  के  साथ  रहते  थेमेरे  लिए  उन्होंने  कॉलेज  से  एडमिशन  फॉर्म  भी  खरीद  लिया  थामुझे  फॉर्म  देते  हुए  कहने  लगे  –  “इस  फॉर्म  को  भर  लेनासाथ  में  पासपोर्ट  साइज  के  फोटोग्राफ  भी  लगने  हैंउस  पर  हस्ताक्षर  मैं  कर  दूंगापश्चात  मैं  गेस्ट  हाउस  चला  आया.”

दूसरे  दिन  ही  मेरा  कॉलेज  में  एडमिशन  हो  गयायह  सब  सरदारजी  साहब  के  प्रयासों  से  ही  संभव  हुआ  थाक्योंकि  अंग्रेजी  में  एम.ए.  करने  के  लिए  छात्र -  छात्राओं  का  अभाव  रहता  थाफिर अंग्रेजी  सुनने - सुनाने  में  तो  अच्छी  लगती  थी,  किन्तु  जब  व्यक्तिगत  रूप  से  अध्ययन  करने  की  बारी  आती  थी  तो  कई  विद्यार्थी  एम.ए.  फर्स्ट  ईयर  से  ही  छोड़कर  चले  जाते  थेएडमिशन  लेते  समय  सरदारजी  साहब  ने  मुझे  यही  हिदायत  दी  थी  कि  मन  लगाकर  पढ़नाबच्चों  के  समझ  में  नहीं  आता  है  तो  छोड़कर  चले  जाते  हैंमैंने  उन्हें  आश्वासन  दिया  था  कि  मैं  मन  लगाकर  पढूंगा  तथा  विश्वास  के  साथ  एम.ए.  पास  करूँगा.

एडमिशन  की  समस्या  हल  हो  गयी  थी. अब  समस्या  थी  खर्चे  की  और  पूना  शहर  में  दो  वर्ष  रहने  कीक्योंकि  जिस  गेस्ट  हाउस  में  मैं  ठहरा  था  वहां  पर  अधिक - से - अधिक  सात  दिन  तक  ही ठहर  सकते  थे.

मुझे  अपने  घर  से  पिताजी  जो  रकम  भेजेंगे  वह  रहने  के  लिए  पर्याप्त  नहीं  थीइसलिए  मैं  सोच  रहा  था  कि  शाम  के  समय  ट्यूशन  पढ़ाने  का  काम  कर  लूंगापर  अब  ख़ुशी  इस  बात  की  थी  कि  एडमिशन  हो  गया  था  तथा  पंजाब  से  जो  सपना  पूरा  करने  के  लिए  मैं  पूना  आया  था  उसकी  नींव  डल  चुकी  थी.

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